बुधवार, 21 मार्च 2012

फुटपाथ पर लेटे हुए स्वगत

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आपका'

डा. गुणशेखरgpsharma.webnode.com

फुटपाथ पर लेटे हुए स्वगत
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कितना खुशनसीब हूँ
कि,
बिना कुछ लिए-दिए ही मिल गई है जगह फुटपाथ पर
कि,
यहाँ बिल्कुल भी खतरा नहीं है
किसी जूते भरे पाँव का
जो अनायास पीस जाए उँगलियाँ
तोड़ जाए नाक
कि,
कोई नहीं रोकता मुझे सोने से
कोई नहीं सटकाता डंडे
कोई नहीं अटकाता रोड़े किसी काम में
प्लेटफार्म की तरह डराते नहीं हैं
वर्दी और बिल्ले यहाँ
कोई नहीं कहता कि उठो
अजान का समय हो गया है
या मंदिरों में बजने लगी हैं आरती की घंटियाँ
ज़रूरतें खुद जगा देती हैं यहाँ
मुँह अँधेरे ही
वैसे यहाँ तो मुँह अधेरे में कहना भी बेमानी ही है क्योंकि ,
बिजली रानी की दूधिया रोशनी से नहायी
नागिन-सी लपलपाती सड़कें
काटने को दौड़ती हैं और बगल में पड़े फुटपाथ
अजगर-से सुसुआते रहते हैं
इसी दौरान मैं और मेरी घरवाली
बारी-बारी से हो आते हैं दिशा-मैदान
नाम रख दिया गया है तो कहना ही पड़ेगा
वरना काहे का और कहाँ का मैदान
जहाँ दो इंच की चौड़ी पटरी पर
नाक साँद के बैठना पड़ता हो
उकड़ूँ
और,
अब गिरे कि तब गिरे के ऊहापोह में
जुगनू-सी जागती आँखों के बीच
लगता है कि ज़िंदा है जीव कोई,
लेकिन दे दी गई है सज़ा
गरीबी की कि भुगतो
सालो!भुगतो अपने माँ-बाप की करनी-धरनी
(बिन ज़रूरत के जने पिल्लों की सज़ा)
और,
तुम भी तो कोई कम नहीं
आखिर जन ही दिए हैं
एक के बाद एक दनादन
तीन-चार पिल्ले
बिना किसी ज़रूरत के ।
लो आ गई फारिग हो के करमजली
अभी रोएगी दुखड़ा
कि,
अमुक ट्रैन आके खड़ी हो गई थी
उसमें से चढ़ और उतर रहे थे मुए यात्री
सुड़का रहे थे सुट्टा
कि,
कैसे उसके रेंगते ही बैठने लगे थे लोग
और कुछ बेशरम मुए तो हिले ही ही नहीं थे
अपनी जगह से
कि,
कैसे-कैसे घूर रहे थे उसे
बगल वाली पटरी पर
मुँह लटकाए बैठे नौजवान
जैसे कि,
यह कोई ऐश्वर्या हो
बड़ी हयादार है तो मत जा फ़ारिग होने
आखिर जायें तो जाएं कहाँ वे बेचारे ?
चलो अछा हुआ कि आज कुछ भी नहीं कहा इसने
रूपसी को छेड़ा नहीं किसी ने
कोई हया नहीं आई इसे
घूरा भी नहीं किसी ने
लगता है सेट हो गई है साली किसी से
वरना तुक कोई है डेढ़ घंटे बाद लौटने का
इसे पता है कि
बिना बेड टी के
फ़ारिग नहीं हुआ जाता मुझसे
कब जाएगी दूध लाने
जैसे पता ही न हो इसे
सप्रेटा का दूध कितनी जल्दी खत्म हो जाता है डेरी में।
या फिर आदत हो गई है इसे
मुझे सताने की
शुरू-शुरू में तो
दस-पाँच मिनट में ही
हाथ में लबालब डब्बा लिए
लौट के आके खड़ी हो जाती थी सिर पर
जब खाने को होता भी था घर में
तो भी खाती नहीं थी
दो-दो,तीन-तीन दिन तक
शौच जाने के डर से
और आज जाती है तो-
लौट के आने का मन नहीं होता है कमीनी का!

मंगलवार, 13 सितंबर 2011


बड़े होना जल्दी-जल्दी बेटा!

अभी -अभी
देकर गई है दाई
यह खुशखबरी कि-
बेटा!
तुम आ गए हो
अपनी माँ के
आँसुओँ से भिगो-भिगो कर
छापे गए खुशबूदार फूलों वाले
गीले- गीले आँचल में
माँ से सुना है कि
तू घर भर में सुन्दरतम है
 हो भी क्यों न
उसके बेटे का बेटा है जो
मैंने दाई को
छुप के कुछ देते हुए देखा है उसे
उसके आँचल के खूँट की ऐंठन
बता रही है उसकी चोरी 
मैं,
पकड़ के हिला ही देता हूँ
 माँ के दोनों कंधे
कबूल लेती है ममतामयी माँ
अपनी चोरी खुशी की
कितना अच्छा लगेगा
कल को जब तुम काटोगे
अपनी चोर दँतियों से
जैसे,
मैं काटा करता था
कभी माँ को तो कभी बापू को
गीला कर देना बिस्तर
मैं सरक के सो लूँगा
और तुमहारे नीचे कर दूँगा
सूखा-सूखा गरम बिछौना
गाहे-बगाहे, यही तो-
याद दिलाती रहती है मेरी माँ
तुझे तेरी माँ न भी दिलाए याद तो भी
 याद रखना मेरे लाल!
माँ का क्या
गीली बहुत जल्दी हो जाती है
पर सूखती बहुत देर में है
बेटा! भिगोना मत कभी अपनी माँ को
पिता का क्या है
अव्वल तो वह भीगेगा ही नहीं
और भीग भी गयातो
माँ को गरिया के
झाड़ लेगा पल्ला
पर माँ मरते दम तक
नहीं झाड़ सकती अपना पल्लू
पड़ोसी का छोरा
 जब चलाता है लात अपने बाप पर
और गरियाता है माँ को
मेरी माँ सहम जाती है
बाप के मरे बिना ही
जब विधवा हो जाती है
उसकी अधबयसू माँ
मेरी माँ भी
अपने माथे का सिंदूर
 टटोलती है
तुम ऐसा मत करना कि
काँपे किसी पड़ोसी की माँ
माँ की कद्र ज़रूर करना बेटे!
बाप का क्या है लात खाकर भी
रह लेगा खुश
सह लेगा हज़ार दुख
धर लेगा बर्फ़ के शिलाखंड छातीपर
माँ, माँ फूट पड़ेगी
गंगोत्री की तरह
फिर,
फिर कौन सँभालेगा उसे
मैं कोई शंकर तो नहीं
जो भर लूँगा जटाओं में
बेटे!
बड़े होना जल्दी-जल्दी
पर, इतनी जल्दी भी नहीं कि
कि कुचल दो ममता की लता
और चला दो
पिता के वात्सल्य के बरगदी तने पर
तान-तान कर कुल्हाड़ा
बेटा इतनी तो रखना लाज
कि तुम्हारा बाप
 जो काँप और काँख रहा था
अभी-अभी बारह बजे तक
दहक उठा है खुशी से उसका दिल
चहक उठा है उसका मन-पंछी
इस चहक को बनाए रखना मेरे लाल्
कभी सुनोगे तो जानोगे सच्चाई
कि न तो उसके पास कोई कंबल है न रजाई
फिर भी हिरनौटा-सा उछल रहा है 
माह जनवरी है
और रात के बारह बजे हैं!

 
गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'



सारे भेद भुलाती होली
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जाति, धर्म, भाषाएँ, बोली
सारे भेद भुलाती होली




रंग -बिरंगे कपड़े पहने
आती प्यार लुटाती होली


घर-आँगन बगिया बौराने
काम के बान चलाती होली



सारा रंग - भंग कर देती
जब-जब है फगुनाती होली



झोली भर-भर प्यार गुलाबी

जग को रही लुटाती होली



हर दिल के अंकुरित प्यार को

आती आग लगाती होली



मन का भारी मैल हटाके

दुश्मन, दोस्त बनाती होली



ले कर-कर में कुंकुम रोली
सबको गले लगाती होली



डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा

स्नातकोत्तर शिक्षक ( हिंदी )


मेरी सोई हुई संवेदना

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उस दिन जब तुम्हारी उँगलियाँ

दब गई थीं किवाड़ में

मेरी उँगलियों में भी


लहू छलछला आया था

पोर-पोर में टीस उभरी थी

सो न सका था उस रात

माथे पर छलक आई थीं

पसीने की बूंदें

साँसें हो गई थीं तेज

छाती के भीतर

धधक उठा था ज्वालामुखी

पर,

आज जब कट गया है

तुम्हारा हाथ

न तो छाती गरम हुई है

और न ही आई हैं

माथे पर पसीने की बूंदें

सुना है तुम किसी अस्पताल के

आई.सी.यू. में हो

आऊं भी तो पहचानोगे कैसे

शायद कल तक होश में भी आ जाओ

इस लिए कल आऊंगा तुम्हें देखने

साथ में लाऊंगा सेब, संतरे

और, मीठे-मीठे अनार

छील-छील कर अपने हाथों से

तुम्हें खिलाऊंगा

लेकिन एक बार तुम्हारे

कटे हाथ से

वह संवेदना ज़रूर कुरेदना चाहूँगा

जो दुबक कर सो गई है

मेरी ठंडी छाती के

किसी कोने में.


डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा "
गुणशेखर"


टूट गया बंजारा मन
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माना रिश्ता जिनसे दिल का

दे बैठा मैं तिनका-तिनका

दिल के दर्द,कथाएँ सारी
रहा सुनाता बारी-बारी
सुनते थे ज्यों गूँगे-बहरे
कुछ उथले कुछ काफी गहरे


मतलब सधा,चलाया घन.
टूट गया बंजारा मन.


भाषा मधुर शहद में घोली
जिनकी थी अमृतमय बोली
दाएँ में ले तीर-कमान
बाएँ हाथ से खींचे कान
बदल गए आचार-विचार
दुश्मन-सा सारा व्यवहार
उजड़ा देख के मानस-वन.
टूट गया बंजारा मन.



जिस दुनिया से यारी की
उसने ही गद्दारी की
लगा कि गलती भारी की
फिर सोचा खुद्दारी की
धृतराष्ट्र की बाँहों में
शेष बची कुछ आहों में
किसने लूटा अपनापन.
टूट गया बंजारा मन.

कैसे अपना गैर हो गया
क्योंकर इतना बैर हो गया
क्या सचमुच वो अपना था
या फिर कोई सपना था
अपनापन गंगा-जल है
जहाँ न कोई छल-बल है
ईर्ष्या से कलुषित जीवन.
टूट गया बंजारा मन.

वे रिश्तों के कच्चे धागे
आसानी से तोड़ के भागे
मेरे जीवन-पल अनमोल
वे कंचों से रहे हैं तोल
छूट रहे जो पीछे-आगे
जोड़ रहा मैं टूटे धागे
उधड़ न जाए फिर सीवन.
टूट रहा बंजारा मन.

बाहर भरे शिकारी जाने
लाख मनाऊँ पर ना माने
अनुभव हीन, चपल चितवन
उछल रहा है वन-उपवन
'नाद रीझ' दे देगा जीवन


यह मृगछौना मेरा मन
विष-बुझे तीर की है कसकन.
टूट गया बंजारा मन.
-डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा


सरस्वती वंदना
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हे शारदे! माँ, सार दे माँ!!
ज्ञान की किरण तू पसार दे,
निहार दे, निखार दे,
विचार दे, बुध्दि को,
दूर कर विकार दे,
सोच दे, विचार दे,
ज्ञान-त-भार ले,
ज्ञान की किरण तू पसार दे!
हे शारदे! माँ, सार दे!!
जग को सुधार दे,
वर्ण- वर्ण बिन्दु से,
वाक्य सिन्धु सार दे,
साज दे, सँवार दे,
ढाल दे, कृपाण दे,
कृपाण को सुधार दे,
सीमा पे आँचरा पसार दे
हे शारदे! माँ सार दे!! 

 

 

- गंगा प्रसाद शर्मा